Friday, February 13, 2009

इसका अंदाजा तो पहले से ही था सबको.....

चाँद और फिजा की कहानी में रोज़ नए मोड़ आ रहे हैं. कभी फिजां के मोबाइल में ३ साल से सेव msg सामने आते हैं तो कभी चाँद टी वी पर आकर कहते हैं की वो फिजां का सम्मान करते हैं. सच क्या है कोई नही जानता. शायद जान भी न पाए. लेकिन जो कुछ भी हो रहा है उसकी उमीद तो पहले दिन से ही थी. जिस दिन ये जोड़ा ज़माने की नज़रों से गायब होकर धर्म और अपना नाम बदल कर ज़माने के सामने एक नए रिश्ते के साथ आया था उसी दिन से इस बात के कयास लगने शुरू हो गये थे की ये रिश्ता कितने दिन, हफ्ते या महीने चलेगा. किसी को भी इसका अंदाजा नही था हाँ, सभी इस बात पर एकमत ज़रूर थे की रिश्ता सालों तक तो नही चलने वाला. इसके पीछे सबसे बड़ी वजह दोनों ही प्रेमियों का भूतकाल था और कहते भी हैं की कई बार भूतकाल काफी डरावना बनकर इन्सान के सामने आ जाता है. इस कहानी में भी वही हो रहा है.
चाँद मोहम्मद उर्फ़ चन्द्र मोहन का फिजां यानि अनुराधा बाली से रिश्ता कोई ३ साल पुराना है. हालाँकि पहले से ही सभी को इस रिश्ते के बारे में पता था लेकिन कोई इस बारे में बोलने की हिम्मत नही कर सकता था आख़िर हिम्मत करता भी कैसे मामला हरियाणा के उप मुख्यमंत्री से जुडा था और किसी के पास कोई सुबूत भी नही था. अब सुबूत भी है और बात करने के लिए बहाना भी है. सुबूत के तौर पर फिजा के पास ढेर सरे msg हैं और साथ ही अब तक का सारा घटनाकर्म जिसमे दोनों के प्यार शादी और हो चुके या होने जा रहे अलगाव तक की बातें शामिल हैं. फिजां हालाँकि अपने पुराने बयाँ पर कायम हैं लेकिन चाँद मोहम्मद अब पुरी तरह राजनेता के रूप में आ चौके हैं. मुझे याद है जब दोनों शादी करके मोहाली वापिस लौटे थे तो मीडिया से मुखातिब होते ही चाँद ने कहा था की उन्हें फिजा के सिवा किसी की चिंता नही, वो जन्मजात सी एम् हैं ( उदाहरण के तौर पर उन्होंने कहा था की उनके पहले नाम और अब के नए नाम दोनों में CM आता है. चन्द्र मोहन में भी CM और चाँद मोहम्मद में भी CM) , वो फिजा से बहुत प्यार करते हैं और जब उनसे पूछा गया था की क्या उन्हें अपने बच्चों की यद् नही आती तो उनका जवाब था की उन्हें फिजा के अलावा किसी की भी याद नही आती फिजा ही उनका प्यार, जिंदगी और भविष्य है और इनके लिए वो कुछ भी कर सकते हैं. अब उनके बयाँ है की वो सीमा (अपनी बीवी ) और बच्चों से बहुत प्यार करते हैं और फिजा का सम्मान भी करते हैं.
बयानों के दौर के बीच अब चाँद मोहमद या हो सकता है चन्द्र मोहन, चुप हैं. कहाँ है किसी को नही पता. इंतज़ार है उनके लौटने का . देखो जनाब कब आते हैं और कौन सी नई कहानी लेके सामने आते हैं. सबको इंतज़ार है सबसे ज्यादा फिजा को... उसमे गुस्सा कितना है ये जघजिर है. अब तो चाँद को भगवन माफ़ कीजिये अल्लाह ही बचाए...

Wednesday, February 11, 2009

अराजनीतिक बुद्दिजीवियों

एक दिन / मेरे देश के / अराजनीतिक बुद्दिजीवियों से / जिरह करेंगे / देश के सबसे सीधे सरल लोग / उनसे पूछेगे, वे क्या कर रहे थे / जब उनका देश मरा जा रहा था / धीरे-धीरे /नरम-नरम आग की तरह नन्हा और अकेले ।

कोई उनसे नहीं पूछेगा /उनके खूबसूरत लिबास की बात / दोपहर के भोजन के बाद की / लंबी नींद की बात / कोई नहीं जानना चाहेगा / शून्यता के तमाम सिद्दान्त के साथ / उनकी बांझ लड़ाई / कैसी थी / कोई नहीं जानना चाहेगा, वह तरीका कौन सा है / जिसके जरिए उन्होंने इकठ्ठा किया - रुपया पैसा / उनसे सवाल नहीं किया जायेगा / ग्रीक - पुराणों के बारे में / या नहीं पूछा जायेगा / अपने को लेकर उन्हें कितनी उबकाई आ रही थी / जब उनके भीतर / मरना शुरु किया था एक / कायर की मौत / उनका अनूठा आत्मसमर्थन / जिसका जन्म /शुरु से अंत तक झूठ था /छाया में / उसके बार में कोई सवाल नहीं पूछेगा ।

उस दिन / आएंगे सीधे सरल लोग / अराजनीतिक बुद्दिजीवियो की किताब या कविता में / जिन्हें जगह नहीं मिली / मगर जो लोग रोज उनके लिये जुटाते गये है / उनकी रोटी और दूध / उनकी तोर्तिया और अण्डे / जिन लोगों ने उनकी कमीज की सिलाई की है /जो लोग उनकी गाड़ी चलाकर ले गये है / जो लोग उनके कुत्ते और बगीचे की देखभाल करते रहे है / और उनके लिये खटे है - / वे पूछेंगे ../ क्या कर रहे थे तुम लोग / जब दुख तकलीफ से नेस्तानाबूद गरीब लोग मरे जा रहे थे, / और स्निग्धता और जीवन / उन में जल भुन कर खाक हो रहे थे? / हमारे इस सुन्दर देश के / अराजनीतिक बुद्दिजीवियों ! / उस समय कोई जवाब नहीं दे पाओगे तुम लोग । /


चुप्पी का एक गिद्द / तुम लोगों की गूदा और अंतडी फाड़कर खायेगा, / तुम लोगों की अपनी दुर्दशा ही / खरोंच-काटकर फाड़ती रहेंगी तुम लोगों की आत्मा, / और अपने ही शर्म से सिर झुकाए / तुम लोग गूंगे बने रहोगे ।


( इस कविता को ग्वातेमाला के कवि अटो रेने कस्तिइयो ने है. इसे वरिष्ठ पत्रकार श्री पुण्य प्रसून वाजपई ने अपने ब्लॉग पर डाला है.)

Monday, February 9, 2009

hi guys...!!! उर्फ़ हाय गाये...!!!

बीते कल मेरे बॉस ने जब हरियाणा में गायों की किस्मों की बात की तो अचानक मुझे लगा की इस शहर में रहते हुए यह भूल ही गया हूँ कि गायों के साथ एक उमर में मैं भी रहा हूँ. उस गाँव में जहाँ तालाब पर गायों और इंसानों के नहाने की कोई अलग व्यवस्था नहीं थी. मैंने भी गायों के साथ उसी तालाब में नहाना और तैरना सीखा है. तब मैं गायों को उनकी किस्मों से नहीं, उनके नामों से पहचान लेता था. अब उनकी किस्मों का फर्क भी नहीं याद. हरियाणवी, राठी और सरहाली...ये तीन किस्में हैं गायों की. मुझे नहीं याद था. मेरे बॉस ने बताया. पूछना चाहता था की इनकी पहचान क्या है, लेकिन नहीं पूछा. यह सोचकर की मैं ख़ुद को गाँव से जुड़ा होने का दावा करता रहता हूँ. खासकर चंडीगढ़ की इस आबादी के सामने जिसके लिए गायें आवारा घूमने वाला एक जानवर है. इस आबादी के लिए गायें सडकों को गंदा करने और शायद मन्दिर वाले पंडित जी के कहने पर उपाय करने के काम आने के अलावा और किसी काम नहीं आती. मुझे याद आता है कैसे बचपन में मेरी माँ ने मुझे इक्कीस दिन तक गो-मूत्र पिलाया था, शायद इस उम्मीद में कि मैं गायों कि किस्में याद रखूंगा. अभी पिछले दिनों बाबा रामदेव के एक चेले ने मुझे गो-मूत्र और शहद की बोतल भेंट की इस उम्मीद के साथ कि एक महीना गो-मूत्र पीकर मेरा ब्लड प्रेशर ठीक हो जाएगा और छोटी-मोटी खारिश-खुजली भी जाती रहेगी. लेकिन सच यह है मैं गो-मूत्र की बोतल खोल ही नहीं सका. ऐसे ही रखी है दो महीने से.
वक्त ने गायों कि किस्मों के साथ लोगों कि किस्में भी भुला दी हैं। अब सब एक किस्म के हैं...शहर और गाँव भी एक ही किस्म के हो गए हैं और गायें भी शहरी किस्म की. कूड़ेदान के पास मुंह मारती. हरा चारा तो बुधवार के दिन ही मिलता है. चोपडा साहिब की बेटी को बता रखा है तेईस सेक्टर में रहने वाले पंडित जी ने कि बुधवार को वजन के बराबर हरा चारा गौउओं को खिला देना अपने हाथ से...पेपर में पास को जायेगी और हेल्थ भी ठीक रहेगी. बाकी दिन तो चोपडा साहिब की वाइफ गेट के बाहर का पूरा ध्यान रखती हैं. गायें फूल खा जाती हैं. माली रखा हुआ है फूलों के लिए. बेटी सोमवार का वर्त रखती है, उसे मन्दिर में चढाने होते हैं सफ़ेद फूल. इस लिए लगाये हैं, गायों को खिलाने के लिए थोड़े ही. गायें तो कुछ भी खा लेती हैं. हमें उनसे क्या लेना. बेटी तो दूध पीती नहीं. हम दो जन हैं, वेरका के पैकेट ले लेते हैं. गायों का दूध हमें तो नहीं अच्छा लगता तो गायें को लगें अच्छी. खैर, मैं उन गायों की बात करने रहा था जिन्हें मैंने अपने गाँव में देखा था. घर के चूल्हे पर बनने वाली पहली रोटी पर जिनका पहला हक होता था और दूसरी पर गली में एक एक बच्चे की पहचान रखने वाले कुत्ते का. अब न तो गावों में चूल्हे रहे और न चूल्हों पर रोटी बनाने वाली माएं. और न यह याद रखने वाली औरतें की पहली रोटी गाय के लिए है...क्योंकि गावों में भी अब गायें नहीं रही. गावं की आत्मा को जिंदा रखने वाली बूढी औरतें देने के लिए गायों को ढूँढती हैं. जब गावों में गायों का यह हाल है तो शहरों में कैसा होगा? मेरे एक दोस्त ने कहा अजीब बात है, शहरों में गायें अचानक बढ़ गयी हैं? मैंने हैरानी से पूछा कैसे? तो उसका जवाब था अब शहरों में लड़के नहीं हैं, अब गाये हैं. एक दूसरे को गाये कहते हैं....hi guys॥!!!!

( ये लेख मेरे पत्रकार दोस्त रवि शर्मा ने लिखा है। रवि ने १२ साल पहले पत्रकारिता की शुरुआत की थी। सम्प्रति नई दुनिया के चंडीगढ़ के ब्यूरो चीफ हैं। और २ दिन पहले ही उन्होंने ब्लोगिंग की शुरुवात की है.)

आओ, करोड़पति कुत्ते का नाम बदलें....!!!

दोस्तों , चंडीगढ़ में कल कुत्ता-प्रदर्शनी यानी 'डॉग-शो' लगी थी. कई नस्ल और किस्म के कुत्ते आए थे हिस्सा लेने क लिए. लेकिन सब में एक बात समान थी और वो यह कि उनमें से कोई भी 'स्लमडॉग' नहीं था और उन सभी के मालिक 'करोड़पति' थे. एक कुत्ता तो ऐसा भी था जिसकी कीमत साथ लाख बताई गयी जो लगभग करोड़ रुपये के करीब है. जाहिर हैं कुत्ते को चुरा ले जाने वाला भी करोड़पति बन जायेगा. खैर, मॉडल और एक्टर गुल पनाग भी वहां आई हुई थी. जिस बात ने मेरा ध्यान खींचा वह था उसके कुत्ते का नाम ऑस्कर है. ऑस्कर से मुझे तुरन्त याद आया कि हमारे यहाँ की झुग्गी-बस्ती का एक कुत्ता इन दिनों करोड़पति बन गया है और 'ऑस्कर' पुरस्कार में भी सबसे आगे पहुँच गया है. इसमें क्या बड़ी बात है? हमारे यहाँ तो कुत्तों के नाम ही ऑस्कर हैं...!!
नाम से याद आया कि पिछले दिनों एक बड़ा विवाद यह भी सुर्खियों में रहा कि आमिर खान के कुत्ते का नाम शाहरुख़ खान है. इसका मतलब आमिर साहब भी टॉप लेवल के कुत्तों के शौकीन हैं. नाम बड़ी चीज़ है. स्लम डॉग मिलिनेयर फ़िल्म ने हिंदुस्तान का नाम ऑस्कर तक पहुँचा दिया और लोग हैं कि झुग्गी-बस्ती के कुत्तों के नाम खराब करने का रोना रो रहे हैं. मुंबई झुग्गी बस्ती में रहने वालों ने मोर्चा खोल दिया कि फ़िल्म ने उनकी इज्ज़त मिट्टी में मिला दी. झुग्गी बस्ती के कुत्ते भी अब उनकी इज्ज़त नहीं करते. उन्होंने मांग कि कि फ़िल्म का नाम बदलो. नहीं हुआ. ऑस्कर पाने वालों ने कहा-अज्जी, छोडो भी. कुत्ते तो भोंकते रहते हैं. आप गाना सुनिए. इनका क्या है? कल को बोलेंगे एचऍमवी का निशान बदल दो..उसमें भी कुत्ता बैठा है ग्रामोफोन के सामने.
कुत्ते का नाम बदलने से ही यह भी याद आया कि मेरा एक दोस्त था सर्वमीत सिंह. पत्रकार था. स्पष्टवादी और बेबाक. . सभी अच्छे लोगों कि तरह वह भी जल्दी चला गया इस दुनिया से. एक बार उसने मुझे बताया कि रात को खाना खाने के बाद जब वह सैर करने निकला तो उसे एक महिला मिली जो अपने तीन साल के बच्चे को घुमा रही थी. बच्चे ने गली के एक कुत्ते को देखा और बोला- मम्मी, देखो कुत्ता..!! महिला बोली-नो, बेटा वो डोग्गी है. बच्चे ने फ़िर अपनी भाषा में बोलने कि जिद की कि- मम्मी, वो कुत्ता है. महिला नहीं चाहती थी कि उसका बेटा कुत्ते को कुत्ता कहे. सर्वमीत से रहा नहीं गया. बच्चे से बोला-बेटा, तू मुझे कुत्ता कह ले, पर उसको डोग्गी ही बोल दे. अब यह बताने कि जरूरत नहीं कि महिला ने सरदार जी के साथ क्या किया होगा.
खैर, नाम और बदलने कि मांग से जुड़ी एक ख़बर ने हमारे शौकत मियाँ को काफ़ी तकलीफ दी है. सलून वालों ने 'बिल्लू बारबर' फ़िल्म का नाम बदलने कि मांग रख दी. और हैरानी तो यह है कि नाम तुंरत ही बदल दिया गया. और तो और शाहरुख़ खान ने माफ़ी भी मांग ली. उन्हें पता है ये कोई साधारण नाई नहीं हैं. पेज 3 पर छपने वाले लोग हैं. अंग्रेज़ी बोलने वाले, सिल्विया जैसे, लन्दन से बाल काटने कि ट्रेनिंग लेकर आने वाले. दो दिन के लिए भी हड़ताल पर चले गए तो पेज 3 की सारी पार्टियों का भट्ठा बैठ जाएगा. शौकत मियाँ का कहना है-मिया, हमें चालीस साल हो गए लोगों की हजामत बनाते हुए. रहे फ़िर भी नाई के नाई. एक मौका मिल रहा था नाई से बारबर बनने का..साले, वो भी ले गए.
नाम की महिमा के बारे में मैं ज्यादा नहीं कहूँगा. सिर्फ़ उतनी बात जो मेरे इर्द-गिर्द हो रही है. ऋतू चौधरी के महिमा बनने की कहानी कहने पर गया तो युसूफ साहब से दिलीप कुमार बनने और ऐ.आर. दिलीप कुमार से ऐ.आर. रहमान बनने और करोड़पतियों के कुत्तों का नाम ऑस्कर रखे जाने की बात भी कहनी पड़ेगी. मैं एक ऐसे परिवार की बात जरूर करूँगा जिन्होंने अपनी बेटी का नाम इतना सटीक रखा है कि हैरानी होती है. अंकल जी पंजाब से हैं और आंटी जी हरियाणा से. घर में बेटी हुई तो नाम सोचा जाने लगा. फ़िर दोनों ने मिलकर नाम रखा 'परियाना'-पंजाब और हरियाणा को मिलाकर. अंकल ने दोनों राज्यों को मिला दिया और आंटी ने इसका मतलब निकाला-परी का आना. शायद हमारे पॉलिटिकल लीडर और लड़कियों को गर्भ में मार देने वाले भी सबक ले लें परियाना से.
नाम रखने और बदल लेने का भी रिवाज़ आजकल चल रहा है. लोग तो मानते हैं कि इसकी शुरुआत करीना कपूर कि बहन करिश्मा कपूर ने कि थी जिसने अपना नाम बदल कर मोटर सायिकल जैसा कर लिया था-करिज्मा..!! उसके बाद बॉलीवुड में फैशन चल पड़ा. मुझे याद आता है करीब बीस साल पहले मैंने किसी के घर के आगे लगी नेम प्लेट देखि थी जिसमे kapoor की जगह capoor लिखा था. मैं कई साल तक सोचता रहा की शायद स्पेलिंग ग़लत हो गए है. अब हालत ऐसे हैं कि किसी ने दो 'ऐ' लगा लिए हैं किसी ने दो 'बी'.
मेरे दोस्त आदित्य के ऑफिस में काम करने वाली एक लड़की ने अपने नाम प्रियंका में 'एच' लगा लिया है। उसे विश्वास है कि उसका नया नाम करिज्मा करेगा. देखते हैं. बाकी, एक बात और बता देता हूँ जो मुझे अभी अभी याद आई है. मुझे जानने वाले एक सज्जन ने बताया कि उसने तीन कुत्ते पाल रखे हैं, जबकि उसके पिता कहते हैं कि उनके घर में चार कुत्ते हैं. शेरू, टॉमी, बाक्सर के अलावा चौथा कौन??? चौथा जोनी-यानी मैं...!!! मुझे नाम बदल लेना चाहिए यार॥! कोई जानता है क्या नुमेरोलोजिस्ट???

(इसे मेरे दोस्त रवि शर्मा ने अपने ब्लॉग तमाशा मेरे आगे पर लिखा है। जनाब आजकल गाय और कुत्तों के पीछे पड़े हैं। आने वाले दिनों में और जानवरों का भी नम्बर पड़ सकता है.)

Friday, February 6, 2009

न कुछ था तो खुदा था न कुछ होता तो खुदा होता डुबोया मुझको होने ने न होता मैं तो क्या होता...